प्यार की आबरू को उछालते देखा है ,
इसको सस्ते मैं बिकते देखा है।
ना जाने क्यों सचाई नहीं होती है इसमें ,
ना जाने कितने मासूमों को छलते देखा है।
प्यार मैं होते हैं कई गिले - शिक़वे ,
हमने इसे नफरत मैं बदलते देखा है।
सुना है उसके हाथों मैं बहुत बरकत है ,
ना जाने कितनों की तकदीर बदलते देखा है।
शशांक --- ११ / ०४ / २००६