Tuesday, June 17, 2014

प्यार मैं

प्यार  की  आबरू  को उछालते  देखा है ,

इसको  सस्ते मैं बिकते  देखा  है। 

ना  जाने क्यों सचाई  नहीं  होती है  इसमें ,

ना  जाने कितने  मासूमों  को  छलते  देखा  है। 

प्यार  मैं  होते हैं  कई  गिले - शिक़वे ,

हमने इसे  नफरत  मैं  बदलते  देखा  है। 

सुना  है  उसके  हाथों  मैं बहुत बरकत  है ,

ना  जाने कितनों  की  तकदीर  बदलते  देखा  है। 


शशांक --- ११ / ०४ / २००६ 

प्यार का रूप

प्यार का रूप  शायद यही है,

जीने की तमन्ना , दिल की ख़ुशी ,

सांसो  का  चलना , खून  का दौड़ना 

हाँ  शायद  यही 

पर  क्या दर्द  , आँसू  भी मिलते हैं 

यह सब सोचा  ना  था। 

हाँ , इसीलिये अब  यह पराया  सा  लगने  लगा  है। 

और पराई  चीज़  से  शायद  ही  लगाव  हो , यही  सोच कर  प्यार  को छोड़  दिया 

और 

अपना  ली है नफरत 

हाँ 

क्योंकि नफरत  मैं  जीत  और हार  ,
आँसूं  और दर्द  सब  तो है,

जीने  के  लिए 

शायद  यह  अब  हमारी  आदत  मैं  है. ।


शशांक ---- २५ /०१/२००६