प्यार का रूप शायद यही है,
जीने की तमन्ना , दिल की ख़ुशी ,
सांसो का चलना , खून का दौड़ना
हाँ शायद यही
पर क्या दर्द , आँसू भी मिलते हैं
यह सब सोचा ना था।
हाँ , इसीलिये अब यह पराया सा लगने लगा है।
और पराई चीज़ से शायद ही लगाव हो , यही सोच कर प्यार को छोड़ दिया
और
अपना ली है नफरत
हाँ
क्योंकि नफरत मैं जीत और हार ,
आँसूं और दर्द सब तो है,
जीने के लिए
शायद यह अब हमारी आदत मैं है. ।
शशांक ---- २५ /०१/२००६
शशांक ---- २५ /०१/२००६
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